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लावारिस लाश - हिंदी कहानी | Hindi Kahaniya

 लावारिस लाश - हिंदी कहानी | Hindi Kahaniya


यह कहानी एक ऐसे बच्चे की हैं, जिसके सर से छोटी उम्र में ही माँ - बाप का साया उठ जाता हैं और वह छोटा बच्चा अकेला दर - वदर की ठोकरें खाता हुआ अपनी जिंदगी जीता हैं और ...... 


                                           ❝ कभी कभी जिंदगी, 

                                        पूरी जिंदगी इम्तेहान लेती हैं।



Hindi Kahaniya



धान की पेड़ी जमाते - जमाते सांझ हो गई पर अभी आधा खेत बचा हुआ था। सोचा प्रातःकाल जल्दी आकर काम पूरा कर देंगे, खुले आँगन में सितारों से सजी ठंडी रात गहरा सुख दे रही थी। शंकर अभी कक्षा 4 में पढता था, वह एकमात्र वारिस था, पुरे कुटुंब मे पढ़ने वाला जिससे सबको बहुत आशाएँ थी। एक नजर खेतों की और दौड़ी तो लगा मानो तारे धरती छू रहे हो जिसे " जुगनू " जीवंत कर रहे थे। 


 




अगले दिन की सुबह धन की पेड़ी जमते ही शंकर स्कूल चला गया, पिताजी खेत पर ही रुक गए। शंकर पढ़ने में होशियार था। आधे दिन का स्कूल खत्म होने ही वाला था। तभी किसी ने स्कूल में आकर सूचना दी की शंकर के पिताजी का देहांत हो गया है, शंकर अपना बस्ता और दरीपट्टी वहीं छोड़ नंगे पैर ही खेतों की ओर दौड़ा। पहाड़ सा धुआँ उठ रहा था, रोने की गहरी आवजें कानों में पड़ रही थी। धान के साथ - साथ शंकर के पिताजी भी राख के ढेर में भुरभुरा गये। 12 रोज तक सब शंकर और उसकी माँ को दिलासा देते रहे। एक ही खेत बचा था, जो दो जून की रोटी नसीब कराता था। कुछ दिन का धन शेष रह गया था, बाद में भूखों मरने की नौबत होने वाली थी। शंकर के परिवार वालो ने शंकर को स्कुल छोड़कर मजूदरी करने का दवाब डाला। बिन बाप के कितने ही बाप बन कर आ रहे थे। माँ की कोई सुनता नही था। शंकर दूसरों के खेतों में या इधर - उधर काम कर के कमा लेता था। रात्रि में एक समय पेट भर कर भात मिलता था, जिसे माँ बड़े ही प्यार से आँसु पौंछ कर शंकर को खिलाती। माँ रोना नहीं बापू मर गए पर मैं तो जिन्दा हूँ, कल से ज्यादा मेहनत करूँगा और ज्यादा पैसे कमाऊंगा फिर हम दो वक्त खाना खा सकेंगे। बेटा मुझे चिंता हैं! किस बात की ? - शंकर ने पूछा। की तेरा ख्याल कौन रखेगा। अरे! तुम हो ना माँ, नहीं बेटा मैं ज्यादा दिन नहीं जी सकुंगी। तभी पीछे से शंकर का चाचा नारायण थोड़ा झल्लाते हुए बोला, भाभी कल से तुम भी शंकर के साथ काम पर जाना, घर का खर्चा मुश्किल से चल रहा हैं। दोनों माँ - बेटा दुःख के मारे भात निगल नहीं पा रहे थे। निशा को आज जैसे नशा हो गया, उतरने का नाम ही नहीं ले रही थी। रात बहुत बड़ी लग रही थी। एक - दूसरे को देखते - देखते पूरी रात निकल गई। थोड़ी सी झपकी लगी शंकर की पर माँ की आँखे खुली की खुली थी। हर रोज की तरह शंकर ने कहा - माँ मैं जा रहा हूँ आप चिंता मत करो, मैं शाम को जल्दी लौट आऊंगा।  माँ - माँ - माँ कोई जवाब नहीं आया देख शंकर माँ से लिपट कर जोर - जोर से रोने लगा। अब शंकर अनाथ हो गया था। दुःख के पहाड़ गिरते ही जा रहे थे वहीं क्रम पुनः दोहराया गया। तेहरवें दिन शंकर के चाचा ने बहुत झगड़ा किया, दस आने से कम लाए तो घर मत आना, इस घर में अब तुम्हारा कोई नहीं हैं। दिन - भर में इधर - उधर मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से 6 आने मिलते। घर जाने का मन नहीं करता पर माँ - बाप की सूनी यादें खींच लाती। 10 आने नहीं लाने पर शंकर को खाना नहीं मिलता, रोज मार पड़ती थी। " हाथ तो बहुत उठते थे पर संभालने वाला कोई हाथ नहीं था"। 




सो कर उठता तो शरीर में पीड़ा होती थी, 12 साल का शंकर भूख - प्यास से चौबीस का लगने लगा था। आज शंकर घर न जाने का मन बना चूका था और वहीं सड़क के किनारे लेट गया। दो रोज से शंकर घर नहीं लौटा, क्रोधित नारायण हाथ में बांस का डंडा लिए चला आ रहा था। शंकर ने नारायण को आते देख लिया और भागकर शहर जाने वाली बस में चढ़ गया। शरीर से दुर्गन्ध आ रही थी बाल गुथे हुए थे, जिनमे जुआँ रेंग रही थी। कभी आँखों के आंसू पोंछता तो कभी सर को  खुजालता, दुःख के मारे छाती फटी जा रही थी, कहीं भी ठिकाना नहीं रहा। कंडक्टर ने पूछा कहाँ जा रहे हो, किराया दीजिये। एक आना निकाल कर शंकर ने उसके हाथ में थमा दिया और कुछ नहीं बोला। अंतिम सफर पर जा कर बस रुकीं, शंकर भी उतर गया, वहां ज्यादा कोई नहीं था बस एक - दो चाय की दुकानें थी और सामने रेलवे स्टेशन। "डबडबाई आँखे बहुत कुछ कह रही थी"। 







कूड़ेदान से शंकर कुछ ढूंढ रहा था, थोड़ा कुछ निकाल कर खाने लगा, हाय रे! जिंदगी क्या - क्या दिखलाती हैं। दो - चार दिन यही क्रम चलता रहा और एक दिन किसी की नजर शंकर पर पड़ी, उसकी स्थिति देख कर बोला, - यहां काम करोगे तो पैसा भी मिलेगा और खाना भी। शंकर को और क्या चाहिए था, शंकर ने अपनी मुंडी हिला कर अपनी रजामंदी दे दी। रेलगाड़ी रुकते ही माल उतारा जाता और कुछ चढ़ाया जाता था। अब शंकर अकेला नहीं था उसके कुछ और साथी भी थे जो दिन - रात उसके साथ रहते थे। 





दिन - भर काम से थक कर चूर हो जाता, भोजन करने से पहले शंकर माँ - बाप को याद करता हैं, उसके साथी उसे ढांढस बंधाते। एक साथी  ने अपनी बाईं जेब से कुछ निकाल कर शंकर के हाथ में थमा दिया। इसको पी लो अच्छी नींद आएगी - साथी ने कहा। दो घुट में शंकर उसे पी गया। शंकर का माथा जैसे फिरने लगा। थोड़ी कड़वी थी पर हाथ से छूटते ही शंकर को गहरी नींद आ गई। छोटी सी उम्र में शंकर ने क्या - क्या नहीं देखा।  







लंबे समय के बाद शंकर अपने घर गया, पर उसके लिए तो यह हमेशा के लिए कहानी बन चूका था। उसके चाचा अंतिम साँसे रहे रहे थे। नारायण ने शंकर के सर पर हाथ फेरा और चल बसे। शंकर कुछ पैसे लेकर गया था पर किसी ने शंकर से बात तक नहीं की। वह अपने गांव के साहूकार के पास गया, अपने पैसे वहां जमा किये और वापिस आकर लेने की कह कर चला आया। पैसे कमाने की चाहत खत्म हो चुकी थी "किसके लिए कमाए"? 





शराब की लत ज्यादा हद तक बढ़ चुकी थी, जिस वजह से शंकर की जवानी भी बुढ़ापे के जैसी हो गई। दिन - रात शराब के नशे में धुत रहता और एक दिन तबियत अकस्मात ज्यादा  ख़राब हो गई। वक्त रहते उसके साथी असलम ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया पर बहुत देर हो चुकी थी। ज्यादा शराब से शंकर के लिवर ने काम करना बंद कर दिया। पूरा शरीर नीला पड़ चूका था। शंकर के पास वक्त बहुत कम था, उसके सारे साथी उसे घेर कर खड़े थे और उम्मीद बांध रहे थे की तुम्हे कुछ नहीं होगा। शंकर कुछ बोलना चाह रहा था पर अधिक कोशिश के बाद भी शब्द कंठ से बहार नहीं निकले, मुँह खुला का खुला ही रह गया। पुलिस रिपोर्ट तैयार हुई, उसके शव को लेने के लिए उसके गांव सुचना देने शंकर का एक साथी गया, पर जवाब उसके विपरीत आया। शंकर के चाचा के लड़के बोले की "वह तो हमारे लिए बहुत पहले ही मर गया, जब वह यहाँ से भागा था, फिर उसने हमें दिया ही क्या हैं जो हम उसकी लाश को लेकर आए, फिजूल खर्ची ही होगी"।  "कभी कभी जिंदगी, पूरी जिंदगी इम्तेहान लेती हैं, पर मरने के बाद भी यह बहुत बुरा था"। शायद शंकर की रूह को भी सुकून ना आए। शंकर की लाश अपनी मिट्टी का इंतजार कर रही थी। 


                                                                                  लेखक: अशोक कुमार मच्या 


                                                   :- समाप्त :-


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